बारहवीं क्लास में अकेले भारत यात्रा - एकला चालो रे
( इस यात्रावृतांत को भारतीय रेल का सर्वोच्च यात्रा वृतांत पुरस्कार मिला है)
बचपन में पिताजी द्वारा दिए गए संस्कारों में साहित्य अनुराग ने अंतर्मन में कुछ अलग हटकर ही बातें पैदा कर दी थी। उनमें एक यायावरी यात्रा शौक था। बु़द्ध व महावीर का एकाएक घर छोड़कर अज्ञात के दर्शन के लिए निकलना मन को अंदर तक छू जाता था, विमल मित्र के पात्रों का एकाएक यात्रा के लिए निकल जाना और किसी भी अनजान स्टेशन पर उतर जाना, शरतचन्द्र के श्रीकांत में इन्द्रनाथ का यायावरी जीवन मन में कहीं निकलने की ललक पैदा कर देता था। एक दिन मोहन राकेश का ‘आखिरी चट्टान तक’ पढ़ा तो बस अंदर तक हिल गया। लगा कि बस रविन्द्रनाथ टैगोर के एकला चालो की तरह यात्रा के लिए कहीं निकला जाए।
मैं उन दिनों बारहवीं कक्षा में पढ़ रहा था। उन्नीस सौ इक्यासी का वर्ष। उम्र मात्र सत्रह साल। पिताजी रेलवे में थे, उन्हें प्रथम श्रेणी का सुविधा पास मिलता था। सो उन्हीं से अनुनय-विनय कर सुविधा पास की सुविधा हासिल की। पिताजी का क्रोध, पढ़ने की नसीहतें और तमाम मुसीबतों के बाद एक दिन यात्रा के लिए निकल पड़ा। अगस्त का महीना था। कहीं दूर-दूर तक रिजर्वेशन नहीं। पर मन तो था, कन्याकुमारी की आखिरी चट्टान की सीमाओं को छूने का। सो बस देहरादून एक्सप्रेस से सुबह-सुबह निकल पड़ा। यूं दूसरी गाड़ियों को मुम्बई पहुंचने में पन्द्रह घंटे लगते थे। देहरादून एक्सप्रेस करीब बाईस घंटे लगा देती थी। पर और गाड़ियों में रिजर्वेशन कहाँ मिल पाता है।
गाड़ी ने जब कोटा की सीमा को पार किया तो मन में बहुत तसल्ली हुई। मेरे पास सामान के नाम पर एक टीन की अटैची, एक जंजीर-ताला, उस समय मिलने वाला हॉटशॉट का सबसे सस्ता कैमरा। दो चादर। एक कपड़े का छोटा सा पीछे लटकाने वाला थैला। पानी की बोतल। जेब में मात्र एक सौ पिच्चासी रूपए। हां, एक रेलवे का टाईम टेबल। उस समय नेट का प्रचलन नहीं था। सो यह टाईम टेबल हर घूमने के शौकीन के पास मिल जाता था। कहाँ से कहाँ तक कौन सी ट्रेन, किधर से किधर जाना, खाली समय में बस उसे लेकर बैठ जाना। ईमानदारी की बात यह थी कि कई बार यात्रा में उतना आनंद नहीं आ पाता था। जितना घर बैठकर टाईम टेबिल से गाड़ियों का चयन कर प्रोग्राम बनाने में आता था।
यात्रा शुरू हुई। बरसात का महीना था। कोटा निकलते ही हरियाली का दौर शुरू हो गया। दरा की घाटी को पार करते समय मन अभिभूत हो उठा। दरा पर मोड़ इतना घुमावदार था। कि समूची गाड़ी के दर्शन ही हो जाते थे। और चारों ओर फैली हरियाली तो जैसे मन में समा गई।
सुबह से दोपहर हुई और फिर शाम हुई। फर्स्टक्लास के डिब्बे में पीछे की बर्थ गिराकर सीट पर बिछा देने से उसकी उंचाई इतनी हो जाती थी। कि हवा वाला तकिया लगाकर खिड़की पर चेहरा टिक जाता था। यात्रा का सर्वश्रेष्ठ आनंद मुझे यही लगता था। बस लेटकर, बैठकर बाहर देखते जाओ, आब्जर्वेशन यानी निरीक्षण, बस निरपेक्ष भाव से देखते जाओ, पल-पल दुनिया बदलती जाती है। तरह-तरह के लोग, रास्ते में रेल लाईन के किनारे छोटे-छोटे क्वार्टर, आंगन में खेलते बच्चे, कहीं-कहीं बाहर बिछी हुई खाट पर बैठे बुजुर्ग। कहीं दरवाजे के बाहर सुलगती सिगड़ी, और उसे गत्ते से झपकते हुए बच्चे। सबके अलग-अलग सुख-दुख। अचानक अम्मा की याद आ गई।
बड़ौदा में रात हो गई। प्लेटफार्म पर उतरकर एक जगह खाना खाया। बजट सीमित था, और अभी दस पन्द्रह दिन चलाना था, सो कोशिश यही रहती थी कि किसी तरह पेट भर लिया जाए। एक प्लास्टिक की बोतल थी, उसे प्याऊ से भर लिया और बस रात को एक चादर बिछाई और एक ओढ़ी और जल्द ही नींद की आगोश में खो गया।
सुबह नींद खुली तो गाड़ी ने मुम्बई में प्रवेश कर लिया था। मुम्बई हमेशा की तरह जागा हुआ था, लोग बहुत तेजी से इधर-उधर भाग रहे थे। मुम्बई पर उतरा, अब यहाँ से पूना के लिए गाड़ी पकड़नी थी। पहली गाड़ी डकन क्वीन थी। सो बस जाकर बैठ गया।
मुम्बई से गाड़ी चली। बरसात का मौसम था। रास्ता बहुत ही खूबसूरत था। अच्छी-खासी बरसात हो रही थी। छोटे-छोटे पहाड़ों को पारकर ट्रेन आगे बढ़ रही थी। बरसात में मुम्बई-पूना मार्ग का सौन्दर्य तो देखते ही बनता है। अनगिनत झरने यहाँ के सौन्दर्य में चार चाँद लगा देते हैं। इतनी सारी सुरंगे पहली बार देखी थी, मैं तो पागल ही हो गया। एक सुरंग पार करते ही जब गाड़ी दूसरी ओर पहुंचती थी तो दुनिया ही बदल जाती थी। कभी एक ओर धूप होती थी, तो कभी दूसरी ओर बारिश। ऐसे ही बस दिन में गाड़ी पूना पहुंच गई।
पूना पहुँचते ही पहले आने वाली यात्रा का प्रबंध किया। कल की ट्रेन शाम को थी, और मंजिल थी तिरूपति। स्लिपर में एक बर्थ मिल गई। बस मन खुश हो गया। बस प्रथम श्रेणी के वेटिंग रूम में गया और नहा-धोकर घूमने के लिए रवाना। हां , अटैची को क्लोक रूम में जमा कर दिया। कपड़े का पीछे लटकाने वाला थैला मेरे साथ था।
पूना अच्छा शहर है, बहुत सी जगहें हैं देखने वाली। शनिवार वाड़ा, मराठा साम्राज्य की भव्यता का आईना है। पार्वती हिल्स की ऊंचाई से पूना को निहारना अपने आप में बहुत ही सुखद अनुभव है। पर एक जगह मन को छू गई। वो थी, राजा दिनकर केलकर म्यूजियम। अद्भुत जगह थी। साधारण सी वस्तुओं का असाधारण संग्रह। कहने को घर की रसोई से लेकर इधर-उधर देखी गई वस्तुऐं ही जमा थी। पर बेमिसाल थी। बच्चों के खिलौने, गुडलिया, दरवाजे-खिड़कियों की चौखट , दर्पण और न जाने क्या-क्या।
रात वेटिंग रूम में ही बिताई। दो चादरों में एक बिछा ली थी और एक ओढ़ ली थी। बजट कम हो तो रेलवे वेटिंगरूम एक बेहतर जगह है। रोशनी और शोर में मुझे नींद नहीं आती है, पर रोज ही यहीं या गाड़ी में सोना हो। तो क्या करें, नींद आ ही जाती है।
सुबह उठकर वहीं स्टेशन पर नाश्ता किया। और फिर बस पकड़कर घूमने निकल पड़ा। पातालेश्वर मंदिर देखा। बिल्कुल एलिफेंटा के मंदिर की तरह, नंदी और शिव की प्रतिमा। और पत्थर के बने स्तंभ। ऐसा लगता ही नहीं कि आप इतने बड़े शहर में है।
चूंकि शाम को ट्रेन पकड़नी थी। अतः ज्यादा नहीं घूमा। बस स्टेशन आ गया। थोड़ा-बहुत खाकर क्लोक रूम से अटैची निकलवाई और फिर रवाना हो गया, अगली मंजिल तिरूपति के लिए। हालाँकि प्रथम श्रेणी का पास था, पर इस समय बस लग रहा था कि किसी तरह अपनी मंजिल पर पहुंच जाए। भले ही कहीं भी बैठना पड़े।
अगले दिन दोपहर में गाड़ी रेनीगुंटा पहुँच गई। यहाँ से दस किलोमीटर जाना पड़ता था। फिर वहां से बस पकड़कर तिरूमला हिल्स पर स्थित तिरूपति मंदिर के लिए जाना पड़ता था। यह सफर मेरे लिए सबसे मुश्किल था। बस में चढ़ना ही मेरे लिए दशहत पैदा कर देता था। एक तो बस से सफर, फिर पहाड़ के घुमावदार रास्ते। बस में बैठते ही उल्टी होती थी। सो बहुत डर लगता था। खैर जैसे-तैसे घबराते-घबराते सफर कर ही लिया। जिन्हें बस में सफर करते समय उल्टी होती है। उनकी यात्रा अनुभव बड़े विचित्र होते हैं। वे पूरे सफर में उस पल का इंतजार करते रहते हैं।
मैं जैसे-तैसे उतर तो गया, पर मेरी स्मृति में बस कल का आने वाला सफर तनाव पैदा कर रहा था। पर खैर मैं तिरूपति में घूमने लगा। रात को एक जगह चावल-संाभर खा लिए। अब रात को ठहरने का प्रबंध करना था। कुछ मिल नहीं रहा था। हां, बजट भी कम था। सो वहीं पर ट्रस्ट की धर्मशाला थी। अब कोई अलग कमरा तो नहीं था। पर एक बड़ा हाल था, जहाँ पर बस अपनी चादर बिछाओ और लंबे हो जाओ। बस यही सब तो मैं अनुभव करना चाहता था। गाँधीजी की तरह भारतदर्शन के लिए निकलना, लोगों को देखना, उनके अनुभव, उनके जीवन के सुख-दुख के बारे में जानना, लोगों से बातें करना, यात्रा का असली सुख यही है। यह नहीं कि बस चंद जगह चुनो, वहां के सारे दर्शनीय स्थल को छू लो , ताकि सभी लोगों को जाकर बता सको। कि हम आउटिंग करके आए हैं। हमने यह-यह घूम रखा है।
रात भर बस लोगों की बातें सुनते-सुनते न जाने कब आँख लग गई। हालांकि भाषा समझ में नहीं आ रही थी। सुबह करीब तीन बजे ही नींद खुल गई। बस कुछ देर बाद एक छोटे से स्टेडियम में जाकर कुर्सी पर बैठ गए। यहाँ लोग दर्शन के पहले काफी पी रहे थे, व नाश्ता भी कर रहे थे। कुछ इंतजार के बाद सूर्योदय हुआ और फिर लोग दौड़ लगाने लगे। एक गैलरी में लाईन लग गई और फिर अधिक देर नहीं हुई और भगवान वेंकटेश्वर के दर्शन हो गए। बस दर्शन किए। कुछ प्रसाद वगैरह लिया। और बाहर आ गए। बाहर आकर फिर एक बार चावल का भोजन किया और वापस आने को तैयार हुआ। बस का सफर एक बार फिर मुंह बांये खड़ा था। एक बार तो लगा कि पैदल-पैदल ही नीचे पहुंच जाऊं। राम-राम करते नीचे पहुंचा। बस से इतना जी घबरा गया था। कि जैसे ही बस से नीचे उतरा। ऐसा लगा मानो स्वर्ग मिल गया। सामने बसें रेनीगुंटा स्टेशन जा रही थी। लेकिन मैंने अपना दस किलोमीटर का सफर पैदल ही तय किया। फिर गाड़ी का इंतजार, गाड़ी काफी लेट हो चुकी थी। अब क्या करता, प्लेटफार्म पर इंतजार करता रहा। और फिर रेनीगुंटा से ट्रेन से सवार हो गया, भले ही बहुत देरी से लेकिन अंततः फिर एक सफर प्रारंभ हो गया। दिन भर का थका था सो गाड़ी में लेटते ही नींद आ गई। नींद खुली तो सवेरा हो चुका था। ऊपर के बर्थ पर सोने का आनंद अलग ही है, बस सोते ही रहो। कोई आपको परेशान नहीं करता। गाड़ी न जाने कहाँ चल रही थी, अलग-अलग जगह, अलग नाम......जगह के परिचय के लिए...... टाईम टेबिल उपलब्ध था। बस उसी से पता चला, संभवतः शोरोनुर से गाड़ी बदलनी थी। एक रेलवे स्टेशन पर उतरकर पूछा तो पता चला कि पीछे कोई गाड़ी आ रही है। जो त्रिवेंदम तक जाएगी। बस शोरोनुर में उतर गया। वहां पर कुछ देर प्रतीक्षा की और फिर त्रिवेंदम वाली गाड़ी के एक स्लीपर डिब्बे में चढ़ गया।
बिना रिजर्वेशन के डिब्बे में चढ़ना, फिर वहां पर किसी से अनुनय-विनय कर बर्थ के एक और सिमटकर बैठना, फिर थोड़ी देर में आराम से जगह बना लेना, फिर परिचय, बातचीत और फिर खाने-पीने तक पहुंच जाना, यह हमारी पारंपरिक विशेषता है। पर केवल इतना पर्याप्त नहीं था। सबसे महत्वूपर्ण था, अपने जेब में रेलवे पास होना। पिताजी का रेलवे पास बहुत ही विश्वास प्रदान करता था, लगता था कि सबकुछ अपना है, पारिवारिक है। बस अपनी रेलवे है। अपना संयुक्त परिवार। सचमुच बचपन से रेलवे से जुड़ा होना एक अलग ही भावना प्रदान करता है।
गाड़ी केरल में प्रवेश कर चुकी थी। इतना हरा- भरा ..... सुंदर इतनी हरियाली तो मैंने बहुत कम देखी थी...कहीं जमीन नजर ही नहीं आ रही थी। कहीं हल्की बरसात, कहीं भारी...कहीं बस अपलक खिड़की के पास बैठा देखता रहा। बरखा की बूंदो में नहाई हुई हरियाली.... नारियल के पेड़, धान के खेत, रबर प्लांट ...। जब मैं केरल की सुंदरता पर मुग्ध हो रहा था, तो मैंने महसूस किया, मेरे सामने बैठा सहयात्री थोड़ा असहज लग रहा था... बहुत बैचेन था.... वो बार-बार उठता.... गैलरी में चक्कर लगाने लगता। गाड़ी की गति थोड़ी सी धीमी होती, तो वो परेशान हो उठता । मुझसे रहा नहीं गया, अंततः पूछ ही बैठा। वो एक मिनट तक चुप रहा। फिर बोला,’ दरअसल मैं केरल का रहने वाला हूं, दिल्ली में नौकरी करता हूं। साल भर से इंतजार करता हूं....एक बार पन्द्रह दिन की छुट्टी लेकर घर आता हूं। लगभग तीन दिन आने-जाने में लग जाते हैं। अब यह ट्रेन बारह घंटे लेट चल रही है, यानी कि आधा दिन और चला गया। अब गाँव आने-जाने में टाईम लगेगा।’
पर अंततः गाड़ी पहुंच ही गई। मेरे सहयात्री के चेहरे पर जो मुस्कराहट मैनें देखी वो प्रायः मैंने लोगों के चेहरे पर बहुत कम ही देखी थी। त्रिंवेदम गाड़ी पहुंची तो शाम होने वाली थी। मैंने कोवलम बीच के बारे में पढ़ रखा था। टाईम टेबिल के पीछे लगा हुआ कोवलम बीच का फोटो मेरे मन में गहराई तक बसा हुआ था। बस लगा कि जल्दी से मैं वहां पहुंच जाउ। मैंने अपनी अटैची क्लोक रूम में जमा की और बाहर निकल गया। बस वहां से थोड़ी दूर से मिलती थी। ऑटो या टैक्सी बहुत मंहगी पड़ती थी। पुलके आसपास से एक बस मिल भी गई। और मैं रोमांचित था, सूर्यास्त के पहले मैं वहां पहुंच गया था। सागर, पता नहीं इतना आर्कर्षित क्यों करता है। विशाल सागर, कोई ओर न छोर, लहरें ही लहरें, तट पर लोगों का सैलाब बस सूर्यास्त का इंतजार करता हुआ। अंततः सूर्यास्त हो ही गया।
मुझे घूमने का बहुत शौक है। देश में तीन जगहें मुझे बहुत आर्कषित करती है। एक समुद्र, एक हिमालय और एक वीरान सा रेगिस्तान। बस मुग्ध कर देते हैं। समुद्र की लहरों में अजीब सी सम्मोहन शक्ति होती है। बस देखते ही जाओ, लगता है कि निगाहें बस चिपक ही गई। अंधेरा होने तक वहां बैठा रहा। बस जल्दी से स्टेशन वापस पहुँच गया। खाने का मामला थोड़ा बिगड़ गया था। रोटी-सब्जी खाने वालों को अनवरत चावल खाना अजीब सा लग रहा था। हालाँकि अपने शहर कोटा में हम दक्षिण भारतीय भोजन बड़े चाव से खाते थे। पर यहाँ रोजाना दोनों समय यह खाकर अजीब सा लग रहा था।
रात का तो बस एक ठीया था, फस्र्ट क्लास वेटिंग रूम। एक चादर पहले ही थैले में रख ली थी। बोतल में पानी भरा, और बस सो गया। वेटिंग रूम में बस एक ही परेशानी थी, कि रात भर रोशनी रहती थी और गाड़ी आने पर शोरगुल होने लगता था। पर अब लग रहा था कि आदत पड़ गई थी। न जाने कब मैं सो गया। यहाँ बहुत सुबह ही नींद खुल जाती थी।
सुबह उठा। अब लगा क्या करें। कन्याकुमारी जाना था। देश के अंतिम छोर पर बने विवेकानंद रॉक को छूने को मैं बेताब था। पर अभी समय था मुझे लगा कि यहाँ के प्रसिद्ध पदमनाभस्वामी के मंदिर को देख ही लेना चाहिए। स्टेशन से मंदिर अधिक दूर नहीं था। दक्षिण भारतीय मंदिरों का शिल्प वाकई अद्भुत है, जितनी तारीफ की जाए, उतनी कम है।
दोपहर खाना खाकर ट्रेन से निकलना था। बस तैयार हो गया। कन्याकुमारी अधिक दूर नहीं था। बस जल्दी ही पहुंच गया। यात्रा का अंतिम छोर आ गया। कन्याकुमारी के लिए ट्रेन में अधिक भीड़ थी, स्टेशन भी बिल्कुल सुनसान था। शहर थोड़ा ही दूर था। बस चलकर बस्ती में आ गया। यहाँ पहली बार होटल किराए पर लिया। बहुत ही छोटा सा कमरा था। मात्र एक बेड ही था। और किराया भी एक दिन का पच्चीस रूपए। एक शीशा लगा हुआ। बस अटैची रखी और हाथ-मुंह धोकर बाहर आ गया।
देश के अंतिम छोर पर आकर एक अलग सी अनुभूति हो रही थी। सागर के सामने आकर बहुत ही अच्छा लग रहा था। अरब सागर, बंगाल की खाड़ी और हिन्द महासागर तीनों सामने ही थे। सूरज छिपने वाला था। बस सामने सागर की लहरें उफान पर थी। बस एक जगह बैठकर मैं सूरज को डूबते हुए देखने लगा। सूरज धीरे-धीरे सागर में समा गया। मुझे अचानक लगा मैं कहाँ बैठा हूं। दूर बहुत घर में अम्मा क्या कर रही होगी। शाम ढलने को थी, लगा कि गाँव में क्या हो रहा होगा। कच्चे मकान में नीम के पेड़ के तले काकीजी ने चूल्हा जला लिया होगा। और मैं यहाँ बहुत दूर बैठा हूं। रात को कन्याकुमारी मंदिर के दर्शन किए, खाना खाकर बस सो गया।
सुबह लोगों के बातें करने से मेरी नींद खुल गई। मंदिर की आरती की आवाज लाउडस्पीकर के कारण गूंज रही थी। अभी सूरज निकलने में देर थी। बस जल्दी से चलकर समुद्रतट पर आ गया। समुद्रतट पास ही था, सूर्योदय देखना था। बस जाकर वहां बैठ गया, काफी भीड़ इकट्ठी हो गई थी। धीरे-धीरे सूर्य निकला, लालिमा से समुद्र नहा उठा था।
अब सफर का सर्वाधिक रोमांचक पहलू था, विवेकानंद रॉक का सफर। बोट में बैठकर बस कुछ पलों में ही मैं विवेकानंद रॉक पर था। बहुत ही रोमांचक लगता है कि यहाँ चट्टान पर कभी विवेकानंदजी ने समाधि लगाई थी। बहुत देर तक ध्यान कक्ष में बैठा रहा। बिल्कुल खामोश। बहुत देर तक रेलिंग के पास बैठकर समुद्र की लहरों को देखता रहा। फिर वापस होटल आया। नहा-धोकर, नाश्ता कर मैं अपने रोमांचक सफर पर निकला। समुद्र के किनारे पर जाकर मैंने अपने चप्पलों को एक थैली में डालकर अपने थैले में डाल लिया। पीठ पर लटके थैले में एक पानी की बोतल थी, खाने को बिस्किट थे। पर नंगे पांव ही समुद्र किनारे चल दिया। बहुत देर तक चलने के बाद वहां एक चटटा्न पर कुछ बैठे बच्चों के साथ बैठ गया। वे मछली पकड़ रहे थे। मैंने उनसे बात की। भाषा आड़े आ रही थी। पर फिर भी हम एक दूसरे की बात समझ भर रहे थे। बच्चे हिंदी फिल्मों के बारे में काफी जानते थे, अभिताभ बच्चन के जर्बदस्त फैन थे। बहुत छोटे-छोटे सपने थे उनके। बस टीचर बनना चाहते थे, गाँव से कन्याकुमारी जाकर पढ़ाना चाहते थे। उन्होंने मुझे एक सुदंर सी सीप भी भेंट में दी। मै अभिभूत सा आगे बढ़ता रहा। आगे जाकर एक चर्च तक गया। अब काफी दूर आ गया था। बस यहाँ से वापस लौटना शुरू किया, एक जगह कॉफ़ी जरूर पी।
यहाँ एक जगह खाना खाया। रोटी के नाम पर मैदा की बनी रोटी थी। जैसे-तैसे खाकर वापस चला। शाम तक त्रिवेंदम पहुँच गया। वेटिंग रूम में एक परिवार हिंदीभाषी मिल गया। वहीं आगरा का था, और रेलवे में ही नौकरी करते थे। रात को वे भी वेटिंगरूम में सोए, मैं भी वहीं सोया। उन्होंने आगरा का पेठा और दालमोठ दिए। सचमुच बहुत अच्छा लगा, बहुत दिनों बाद अपने घर का स्वाद मिला।
सुबह हो गई। दिन में ट्रेन थी। वैसे तो कोवलम बीच देख लिया था। लेकिन आगरा के परिवार में मेरा ही हमउम्र नवयुवक था, उसने इच्छा जाहिर की और हम एक बार और कोवलम बीच पर हो आए। समुद्र की लहरें बस फिर मन को छू रही थी। अब लगा, पता नहीं कब इन्हें देखना होगा। सफर का अंत हो रहा था। बस दिन में ट्रे्न में बैठ गया। बस खिड़की पर बैठे-बैठे बाहर की दुनिया को देख रहा था। खूबसूरत दुनिया... सफर की थकान...सफल यात्रा.... और इतने दिन बाद घर की याद... बहुत अजीब सा लग रहा था। बस धीरे-धीरे रात हुई, फिर सुबह...बीना में गाड़ी बदली। बस फिर सब नजदीक था। रात को सात बजे कोटा पहुँच गया। एक सुखद यात्रा।
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