बचपन की धुंधली स्मृतियों में झांककर देखता हूं। तो पिता की ऊँगली पकड़े एक छोटा सा बच्चा नजर आता है। दुबला-पतला, निकर-बुशर्ट पहने। पांव में एक नीली बत्ती वाली चप्पल। जिसे गर्व से वो अपने साथियों को बताता था कि यह बाटा की है। शायद दो कमरों के किराए के मकान में एक पुरानी साईकिल, एक एरियल वाला रेडियो, एक सीलिंग फैन की कुल जमा पूंजी में एक बड़ी ब्रांड से कम नहीं थी । वो छोटा बच्चा मैं ही था। पिताजी की उंगलियों की पकड़ में गहरा विश्वास समाया था। वो विश्वास आज तक मैं अपने जीवन में नहीं जुटा पाया हूं। उस मजबूत पकड़ को साथ लिए, मैंने देश के न जाने कितने कोने नाप लिए थे। पिताजी शचीन्द्र उपाध्याय हिंदी के बड़े लेखक थे। राजस्थान साहित्य अकादमी से पुरस्कृत। साहित्य के प्रति अनुराग उनसे ही विरासत में मिला है। साहित्य के साथ ही, पिताजी को पर्यटन से गहरा लगाव था।
बचपन से ही उन्होंने मुझे
पुस्तकें पढ़ने का गहरा संस्कार दिया। खाने-पीने और कपड़ों के मामले में जितनी
समृद्धता नहीं थी। उतनी किताबों के मामले में अवश्य थी। दो कमरों का घर, जिनमें
कोई मेहमान आता था तो सोने की पर्याप्त जगह नहीं थी. लेकिन घर किताबों से अटा पड़ा
था। जिससे प्रभावित होकर, मैंने पांचवी-छठी
कक्षा तक बहुत सारा बंगाली, रूसी व हिंदी साहित्य पढ़ डाला।
गहरा जीवन संघर्ष था पर जीवटता विकट थी। साहित्य के पात्रों की चर्चा में अक्सर
पर्यटन उद्धरण पर पिताजी भावुक हो जाते थे। किसी किताब में कोई अद्भुत चरित्र व
प्राकृतिक चित्रण में वो खो जाते थे। पहला उदाहरण था, शरतचन्द्र
का उपन्यास श्रीकांत,जिसमें वो साहसी मित्र इन्द्रनाथ के साथ
आधी रात को गंगा किनारे घूमता रहता था । गंगा की लहरों में डोलती नाव, रात के सन्नाटे में घूमते जानवर, और बहते हुए पानी
में लिपटे सांप। फिर बेफिक्री से डरते हुए श्रीकांत के साथ श्मशान में मुर्दों के
साथ सहजता। जब पिताजी मुझसे इन बातों पर बात करते तो हम भूल जाते कि हम किराए की
दस बाई दस की कोठरी में रह रहे हैं। बल्कि आधी रात को गंगा की लहरों में नाव पर
सवार महसूस करते.
वो ऐसे उद्धरणों में पिताजी बहुत
भावुक रहते। ऐसे ही अमरीकन लेखक अर्नेस्ट
हेंमिंग्वे की ‘द ओल्ड मेन एंड द सी‘ की चर्चा। जब बूढ़ा मछुआरा मछली के शिकार के
लिए अथाह समुद्र में विचरण कर रहा होता तो लगता हम भी उसके साथ दूर तक फैले हुए
समुद्र का आनंद ले रहे हैं। मुख्य चित्रण बूढे सेंटियागो का था, जो स्वयं को नाकारा मानकर गल्फ स्ट्रीम में अकेला मछली
पकड़ने जाता है। वो उपेक्षित बूढ़े आदमी के जीवन संघर्ष की कहानी है। पर पिताजी ने
उसमें से अथाह समुद्र में अकेली यात्रा को जी लिया। विशाल समुद्र में अकेली नाव
खेने का अनुभव एक ऐसे किराए के घर में करना, जहां हमारे
अलावा आठ किराएदार और रहते थे। इतने शोरशराबे में विशाल समुद्र के मौन को इतनी
जीवतंता से जीना उन्हीं से सीखा है। बंगाल के प्रसि़द्ध लेखक विमत्र मित्र के हम
बेहद प्रशंसक थे। उनकी एक कहानी में एक दिन नायक अचानक मध्यप्रदेश के एक छोटे से
अनजान स्टेशन पर उतरता है और वहीं रहता है। इन्हीं कहानियों से प्रेरणा लेकर,
अक्सर पिताजी को लगता था कि एक झोला लेकर अकेले ही किसी अनजान
स्टेशन पर उतर जाऐं, वहां रहें और वहां के परिवेश में कुछ
दिन जीऐं और उन पर कुछ लिखें। रूसी लेखक मक्सिम गोर्की की जीवनगाथा, मेरा बचपन, जनता के बीच और मेरे विश्वविधालय में
मक्सिम के जीवन के प्रसंगों पर हम बेहद प्रफुल्लित हो उठते। अक्सर रूसी साहित्य
में वोल्गा नदी का चित्रण आता तो हमें लगता कि वो हमारी चंबल नदी से अलग नहीं है।
हम उसे बहुत नजदीक से अनुभव करते। बोरीस लेव्रेन्योव की किताब इकतालीसवां हालांकि
एक अदभुत प्रेम कहानी है। पर एक निर्जन द्वीप पर समुद्र पर अकेले रहने की संकल्पना
हमें बेहद आर्कषित करती। बड़ी मुश्किल से सोने की जगह जुटाने वाले छोटे से कमरे में
एक निर्जन द्वीप में अकेले रहने का विजन निर्मित करना अद्भुत था।
प्रकृति चित्रण के सहज
आर्कषण को विभूतिभूषण वंधोपाध्याय की पुस्तक आरण्यक ने चरम पर पहुंचा दिया। बहुत
अद्भुत पुस्तक है वो। मेरे जीवन में सबसे ज्यादा पढ़ी जाने वाली पुस्तक। आरण्यक
वाकई निर्जन वन में लिखे जाने वाले उपनिषदों के तुल्य है। वन में रहने वाले सहज
सरल मानवजन का वर्णन और अदभुत प्रकृति चित्रण। एक पुस्तक की चर्चा और वो थी मोहन
राकेश की आखिरी चट्टान तक। भारत में यात्रा पुस्तकों की बेहद कमी है। इनमें यह
अनूठी है । कहानी का पात्र पश्चिमी तट पर चलते हुए कन्याकुमारी की विवेकानंद रॉक
पर अपना सफर खत्म करता है। पिताजी और मैंने कई बार सोचा कि जीवन ऐसा ही होना चाहिए
कि बस एक झोला लेकर निकल जाऐं। और रास्ते भर लोगों से मिलते-जुलते, उनके जीवन के अनुभवों के बारे में उनसे बैठकर बातचीत करते हुए एक यायावर यात्रा
का आनंद शब्दों में उकेरा जाए। ओह, एक बेहद खूबसूरत पुस्तक
का जिक्र करना तो भूल गया वो है। रसूल हमजातोव की पुस्तक मेरा दागिस्तान। रसूल के
पहाड़ी गांव का अद्भुत चित्रण। यूं इस उपन्यास में कथानक का कोई निश्चित फार्मेट
नहीं है। केवल किस्से सुनाती हुई एक सहज सरल किताब। पर हमने अपने हिस्से का तथ्य
पहाड़ी गांव और सरल जीवन को शैली को अपने अनुभवों में समाहित कर लिया। पुस्तकें
अनगिनत हैं। पर सबकी चर्चा संभव नहीं है। पर हमने इनके माध्यम से अपने लिए
प्राकृतिक सौन्दर्य, सामाजिकता और चरित्र चित्रण को आत्मिक
रूप से महसूस किया। जो बाद में पर्यटन के प्रति गहन अनुराग और जुनून का वाहक बना।
जीवन ऐसा ही है। आप जो देखना चाहते हैं, वो ही आपको नजर आता
है। आज बस इतना ही।
बहुत अच्छा लिखा है …यात्रा वर्णन की बहुत कमी है हिंदी में …जारी रखिए इसे
जवाब देंहटाएंपूरी कोशिश रहेगी ...
हटाएंआभार ... जी जरुर
जवाब देंहटाएंअच्छा संस्मरण......👍👍👍
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